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अपोलो सेज हॉस्पिटल भोपाल में पहली बार बोन-मैरो ट्रांसप्लांट, अब कार्टिसेल थैरेपी भी हो सकेगी

भोपाल की 51 साल की सुनीता धनवानी को हल्का कमर दर्द हुआ। उन्होंने सोचा, दवा से ठीक हो जाएगा। दर्द बढ़ा, तो चलना-फिरना मुश्किल हो गया। इलाज के लिए अपोलो सेज हॉस्पिटल पहुंचीं। जांच में पता चला कि उन्हें मल्टीपल माइलोमा है। यह खून से जुड़ी गंभीर बीमारी है, जिसमें हङ्गियों को मज्जा में खराब सेल्स बढ़ जाते हैं। वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. सैकत दत्ता और डॉ. सचिव बंसल ने बताया कि समय पर इलाज नहीं होता, तो बीमारी कैंसर की खतरनाक स्टेज पर पहुंच जाती। परिवार इलाज के लिए बहर जाने की तैयारी कर रहा था।

7 मई को निकाले स्टेम सेल, 9 मई को हुआ ट्रांसप्लांट, अब पूरी तरह ठीक

7 मई को सुनीता के स्टेम सेल निकाले गए। 9 मई को बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ। 18 दिन हेपा फिल्टर्ड आईसीयू जैसी यूनिट में रखा गया। 26 मई को पूरी तरह ठीक होकर घर लौटीं। इस केस के साथ अपोलो सेज हॉस्पिटल में बीएमटी यूनिट शुरू हो गई है। शिवानी अग्रवाल, मैनेजिंग डायरेक्टर, द सेज ग्रुप ने कहा- अपोलो सेन हॉस्पिटल्स में पहली बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता, हमारे समर्पण और उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं की दिशा में निरंतर प्रयासों का प्रमाण है।

शुरू होगी कार्टिसेल धेरैपी: बई बार ट्रांसप्लांट फेल हो जाते हैं, या ट्रांसप्लांट नहीं आ पा रहे हैं, तो ऐसे में कार्टिसेल थेरेपी दी जाती है। कायमरिक एंटीजन कैंसर हुआ, तो टी सेल कैंसर सेल को नहीं मार पाता ऐसे में इम्युनो टारगेटेड थेरेपी की तरह कार्टिसेल थेरेपी से इलाज किया जाता है। बॉडी को इम्युनिटी को ही इस लायक बनाया जाता है कि यह कैंसर सेल को मार सके। सेलेक्शन ज्यादा जरूरी होता है।

कैसे होता है ट्रांसप्लांट: बोन मैरो ट्रांसप्लांट में पहले खून की की में पहले खून की जांच और बोन मैरो बायोप्सी होती है। फिर स्टेम सेल निकाली जाती हैं। मरीज को कौमोथेरेपी दी जाती है। इसके बाद स्टेम सेल वापस शरीर में डाली जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मरीज को संक्रमण का खतरा ना हो इसलिए किसी खतरे से बचाने के लिए हेपा रूम में रखा जाता है।

तीन तरह के होते हैं बोन मैरो ट्रांसप्लांट

  • ऑटोलॉगस ट्रांसप्लांटः मरीज के अपने स्टेम सेल निकाले जाते हैं। कीमोथेरेपी के बाद वही वापस डाले जाते हैं। यह तरीका मल्टीप्ल
  • माक्लोमा और लिंफोमा में होता है। एलोजेनिक ट्रांसप्लांटः स्टेम सेल किसी दूसरे व्यक्ति से ली जाती हैं। यह ब्लड कैंसर और ल्यूकेमिया में होता है।
  • हैप्लोइडेंटिकल ट्रांसप्लांट डोनर आधा मेल खाता है, जैसे माता-पिता या भाई-बहन। यह तकनीक अब सफल हो रही है और कई अपलों में उपलब्ध है।
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